विचार / चर्चा

जब एक ही परीक्षा में 89.26 और 9.40 अंक चयन की सीमा बनें, तो सवाल तो उठेंगे ही...

प्रकाशित: 04 Oct 2026 • Sikar, Rajasthan
जब एक ही परीक्षा में 89.26 और 9.40 अंक चयन की सीमा बनें, तो सवाल तो उठेंगे ही...

राजस्थान में पशुचिकित्सा अधिकारी भर्ती का परिणाम सामने आया।

150 अंकों की परीक्षा।

सामान्य वर्ग की चयन सीमा — 89.26 अंक।

और अनुसूचित जनजाति महिला वर्ग की चयन सीमा — 9.40 अंक।

यानी एक ओर लगभग 60 प्रतिशत अंक, और दूसरी ओर लगभग 6 प्रतिशत अंक।

इन अंकों को देखकर मन में पहला भाव किसी जाति या किसी चयनित अभ्यर्थी के विरुद्ध नहीं आता।

मन में सबसे पहले एक सवाल आता है—

क्या हमारी व्यवस्था में कहीं कुछ ऐसा है, जिस पर समाज को शांत मन से दोबारा विचार करने की जरूरत है?

जरा एक विद्यार्थी के घर की कल्पना कीजिए।

उसने वर्षों पशुचिकित्सा की पढ़ाई की।

परिवार ने फीस भरी।

किताबें खरीदीं।

छात्रावास, आने-जाने, परीक्षा और तैयारी पर पैसा खर्च किया।

डिग्री पूरी होने के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।

सरकारी नौकरी के लिए फिर तैयारी शुरू हुई।

महीने बीते।

शायद साल भी।

घरवालों को उम्मीद रही—

हमारा बच्चा मेहनत कर रहा है, अच्छे अंक लाएगा तो नौकरी जरूर मिलेगी।

फिर परिणाम आता है।

वह बहुत अच्छे अंक लाता है, लेकिन अपनी श्रेणी की चयन सीमा से कुछ अंक पीछे रह जाता है।

और उसी परिणाम में देखता है कि किसी दूसरी श्रेणी में चयन सीमा उससे कई गुना नीचे चली गई।

उस समय उस युवक के मन में क्या चल रहा होगा?

उसकी माँ क्या सोच रही होगी?

उसके पिता, जिन्होंने वर्षों उसकी पढ़ाई पर अपनी कमाई लगाई, वे क्या महसूस कर रहे होंगे?

क्या उनका यह पूछना अनुचित होगा—

“हमारे बच्चे की गलती क्या थी?”

उसने अपना जन्म नहीं चुना।

उसने अपना परिवार नहीं चुना।

उसने अपनी जाति नहीं चुनी।

जन्म किसी मनुष्य के हाथ में नहीं होता।

फिर क्या जन्म से मिली पहचान उसके अवसर को इतने बड़े स्तर तक प्रभावित करे?

यह प्रश्न किसी वर्ग के विरुद्ध नहीं है।

यह प्रश्न व्यवस्था से है।

चयनित अभ्यर्थी को दोष देना गलत होगा

यह बात भी उतनी ही स्पष्ट होनी चाहिए।

9.40 अंक पाने वाला अभ्यर्थी इन 9.40 अंकों के आधार पर पशुचिकित्सक नहीं बना है।

वह पहले से निर्धारित पशुचिकित्सा शिक्षा और डिग्री प्राप्त करने के बाद ही इस भर्ती परीक्षा में बैठा है।

उसने नियम नहीं बनाए।

उसने वही अवसर स्वीकार किया जो वर्तमान व्यवस्था ने उसे दिया।

इसलिए किसी चयनित अभ्यर्थी को अपमानित करना या उसे केवल भर्ती परीक्षा के अंकों के आधार पर “अयोग्य चिकित्सक” कहना उचित नहीं होगा।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि समाज व्यवस्था से सवाल ही न पूछे।

बल्कि असली सवाल यहीं से शुरू होता है—

यदि प्रतियोगी परीक्षा का उद्देश्य योग्य पशुचिकित्सा अधिकारी चुनना है, तो न्यूनतम समान योग्यता सीमा क्यों नहीं?

आरक्षण रहे।

आरक्षित पद रहें।

वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो।

लेकिन क्या एक ऐसी समान न्यूनतम दक्षता सीमा नहीं होनी चाहिए जिसे प्रत्येक अभ्यर्थी को पार करना आवश्यक हो?

उस सीमा को पार करने के बाद आरक्षण लागू किया जाए।

क्या सामाजिक न्याय और न्यूनतम योग्यता को एक साथ नहीं रखा जा सकता?

अब उस पशुपालक के बारे में सोचिए...

राजस्थान के किसी छोटे से गाँव में एक परिवार की गाय अचानक गंभीर रूप से बीमार हो जाती है।

उस गाय से घर का दूध आता है।

उसी दूध से शायद परिवार की रोजी-रोटी चलती है।

शायद उसी पशु की आय से बच्चों की फीस जमा होती है।

वह पशुपालक रात-दिन मेहनत करता है।

कर देता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदान करता है।

सरकार से उसका केवल इतना अपेक्षित अधिकार है कि जब उसका पशु बीमार हो, तो सरकारी पशु चिकित्सालय में उसे गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा मिले।

क्या यह मांग गलत है?

उस पशुपालक की क्या गलती है कि उसके क्षेत्र में किस श्रेणी से कौन-सा अधिकारी नियुक्त हुआ?

पशु यह नहीं पूछता कि डॉक्टर किस जाति का है।

वह केवल इतना चाहता है कि सामने खड़ा चिकित्सक उसकी बीमारी को सही समझे और सही उपचार करे।

तो सवाल यह है—

क्या सरकारी चिकित्सा सेवा की न्यूनतम गुणवत्ता पूरे राज्य में समान नहीं होनी चाहिए?

फिर प्रतियोगी परीक्षा किसलिए?

यह प्रश्न भी गंभीर है।

यदि पशुचिकित्सा की डिग्री प्राप्त कर लेना ही यह प्रमाण है कि प्रत्येक अभ्यर्थी सरकारी सेवा के लिए समान रूप से सक्षम है, तो फिर अलग से प्रतियोगी परीक्षा क्यों?

और यदि प्रतियोगी परीक्षा इसलिए ली जाती है कि उम्मीदवारों की योग्यता, ज्ञान और तैयारी में अंतर पहचाना जा सके, तो फिर परीक्षा के अंकों का महत्व कहाँ तक है?

एक ओर हम युवाओं से कहते हैं—

पढ़ो।

मेहनत करो।

प्रतियोगिता करो।

अच्छे अंक लाओ।

दूसरी ओर परिणाम आने पर यदि चयन सीमाओं में इतना बड़ा अंतर दिखाई देता है, तो स्वाभाविक रूप से युवा पूछेगा—

“मेहनत की सीमा कहाँ समाप्त होती है और जन्म की भूमिका कहाँ से शुरू होती है?”

यह प्रश्न सुनना हमें असुविधाजनक लग सकता है।

लेकिन सवाल असुविधाजनक है, इसलिए उसे दबा देना समाधान नहीं हो सकता।

सामाजिक न्याय जरूरी है — लेकिन उसका स्वरूप क्या हो?

यह भी सच है कि हमारे समाज में ऐसे परिवार और समुदाय रहे हैं जिन्हें लंबे समय तक शिक्षा, संसाधन और अवसर समान रूप से उपलब्ध नहीं हुए।

उन्हें आगे लाना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।

जिस बच्चे के पास फीस नहीं है—

सरकार उसकी फीस दे।

जिसके पास किताबें नहीं हैं—

उसे किताबें दे।

छात्रवृत्ति दे।

छात्रावास दे।

भोजन दे।

निःशुल्क तैयारी करवाए।

अच्छे शिक्षक उपलब्ध करवाए।

अतिरिक्त प्रशिक्षण दे।

जिस बच्चे की दौड़ बाकी बच्चों से बहुत पीछे से शुरू हो रही है, सरकार उसका हाथ पकड़कर उसे प्रारंभिक रेखा तक लाए।

लेकिन जब वही व्यक्ति डॉक्टर, पशुचिकित्सक, शिक्षक, अभियंता या किसी अन्य जिम्मेदार पद पर बैठने जा रहा हो, तब न्यूनतम दक्षता की रेखा क्या सबके लिए समान नहीं होनी चाहिए?

यही वह प्रश्न है जिस पर हमें विचार करना चाहिए।

सेना का उदाहरण भी सोचने पर मजबूर करता है

भारत की सशस्त्र सेनाओं में जाति आधारित आरक्षण की वही व्यवस्था लागू नहीं है जो सामान्य सरकारी नौकरियों में देखने को मिलती है।

क्यों?

क्योंकि वहाँ देश की सुरक्षा, परिचालन क्षमता और निश्चित मानकों को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।

निश्चित रूप से सेना और चिकित्सा सेवा एक जैसी नहीं हैं।

लेकिन इससे एक प्रश्न तो निकलता है—

यदि देश की सुरक्षा के लिए एक निश्चित न्यूनतम क्षमता आवश्यक मानी जाती है, तो जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े क्षेत्रों में न्यूनतम क्षमता का साझा मानक क्यों नहीं होना चाहिए?

चिकित्सा में गलत निर्णय किसी मनुष्य के जीवन को प्रभावित कर सकता है।

पशुचिकित्सा में गलत निर्णय किसी पशु के जीवन के साथ-साथ पशुपालक की आजीविका को प्रभावित कर सकता है।

शिक्षा में कमजोर गुणवत्ता केवल एक बच्चे को नहीं, पूरी आने वाली पीढ़ी को प्रभावित कर सकती है।

तो क्या इन क्षेत्रों में समाज को न्यूनतम समान दक्षता की मांग करने का अधिकार नहीं होना चाहिए?

और उस विद्यार्थी के मन की बात भी सुनिए...

हम अक्सर आरक्षण की चर्चा आंकड़ों और कानूनों में करते हैं।

लेकिन उसके पीछे मनुष्य भी हैं।

कल्पना कीजिए उस युवा की, जिसने पूरी ईमानदारी से तैयारी की।

उसे बचपन से यही सिखाया गया—

मेहनत करोगे तो आगे बढ़ोगे।

लेकिन जब परिणाम आता है और वह देखता है कि जन्म से निर्धारित श्रेणी ने अवसरों के बीच बहुत बड़ा अंतर पैदा कर दिया है, तो उसके मन में निराशा आना स्वाभाविक नहीं है क्या?

क्या इससे समाज में दूरी कम होगी?

क्या इससे जाति की पहचान कमजोर होगी?

या कहीं ऐसा तो नहीं कि जाति को समाप्त करने की इच्छा रखते हुए भी हमारी व्यवस्थाएँ बार-बार युवाओं को उनकी जाति याद दिलाती रहती हैं?

यह प्रश्न भी समाज को स्वयं से पूछना चाहिए।

शायद बहस “आरक्षण हो या न हो” से आगे जानी चाहिए

हो सकता है समाधान दो अतियों के बीच कहीं हो।

न सामाजिक न्याय को छोड़ा जाए।

न योग्यता को।

न वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व समाप्त हो।

न किसी दूसरे युवा को यह महसूस हो कि उसके जन्म के कारण उसकी मेहनत का मूल्य कम हो गया।

तो क्या ऐसी व्यवस्था बन सकती है जिसमें—

वंचित अभ्यर्थियों को शिक्षा और तैयारी में भरपूर सहायता मिले।

आरक्षित प्रतिनिधित्व बना रहे।

लेकिन जिम्मेदार तकनीकी सेवाओं में एक न्यूनतम समान योग्यता सीमा हर उम्मीदवार के लिए अनिवार्य हो।

और उस समान न्यूनतम सीमा को पार करने वाले उम्मीदवारों के बीच आरक्षण के नियम लागू हों।

क्या यह सामाजिक न्याय और योग्यता के बीच बेहतर संतुलन हो सकता है?

सवाल किसी जाति की जीत या हार का नहीं है

सवाल है—

उस विद्यार्थी के विश्वास का, जो वर्षों मेहनत करता है।

उस परिवार के विश्वास का, जो अपनी कमाई बच्चों की शिक्षा में लगाता है।

उस पशुपालक के अधिकार का, जो गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवा की अपेक्षा करता है।

उस पशु के जीवन का, जो स्वयं अपने लिए आवाज नहीं उठा सकता।

और अंततः सवाल उस व्यवस्था के प्रति हमारे विश्वास का है जो हमें यह भरोसा दिलाती है कि मेहनत, सामाजिक न्याय और सार्वजनिक हित—तीनों एक साथ चल सकते हैं।

इसलिए प्रश्न बहुत सीधा है—

क्या चिकित्सा, पशुचिकित्सा, शिक्षा और अन्य जिम्मेदार तकनीकी सेवाओं में सभी वर्गों के लिए एक समान न्यूनतम योग्यता सीमा होनी चाहिए और उस सीमा के ऊपर आरक्षण लागू होना चाहिए?

यह किसी चयनित अभ्यर्थी या किसी समुदाय के खिलाफ प्रश्न नहीं है।

यह हमारी व्यवस्था से पूछा गया प्रश्न है।

आप क्या सोचते हैं?

अपनी राय अवश्य लिखिए।

तर्क के साथ असहमति भी स्वीकार है, लेकिन किसी जाति, समुदाय या व्यक्ति के लिए अपमानजनक भाषा नहीं। चर्चा व्यवस्था पर हो—व्यक्ति पर नहीं।

संदर्भ स्थान: Sikar

सहायक / प्रमाण फोटो

Author
लेखक

Dr Mukesh Swami

योग्यता सत्यापित
पशुचिकित्सक • बीवीएससी एवं एएच
अनुभव: 29 वर्ष
विशेष अनुभव: पशु चिकित्सा और पशुपालन

29 वर्षों का पशु चिकित्सा एवं पशुपालन क्षेत्र का अनुभव। डेयरी पशुओं के स्वास्थ्य, प्रबंधन और पशुपालक मार्गदर्शन में कार्य किया है। मैदानी अनुभव और व्यावहारिक जानकारी पशुपालकों के साथ साझा करना उद्देश्य है।

अस्वीकरण: यह पोस्ट लेखक द्वारा साझा अनुभव/जानकारी है और admin review के बाद प्रकाशित की गई है। यह व्यक्तिगत पशु के परीक्षण, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। बीमारी की सूचना को आधिकारिक रोग प्रकोप घोषणा न मानें।