<h2>भूमिका: हर सर्दी में दोहराई जाने वाली एक मौन त्रासदी</h2>

<p>उत्तर भारत सहित देश के अधिकांश भागों में शीत ऋतु के आगमन के साथ ही नवजात बछड़ों की मृत्यु-दर (Neonatal Calf Mortality) अचानक बढ़ जाती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में इसे अक्सर “किस्मत” या “कमजोर बछड़ा” मानकर छोड़ दिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि यह एक सुव्यवस्थित,

पहचाने जा सकने वाले और समय रहते रोके जा सकने वाले रोग-समूह (Preventable Disease Complex) का परिणाम है।

एक पशु-चिकित्सक के रूप में मेरे फील्ड अनुभव में, सर्दियों में होने वाली 70–80% बछड़ा-मृत्यु का मूल कारण <strong>Hypothermia-Dehydration-Pneumonia Triad</strong> होता है।</p>


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<h2>नवजात बछड़े की शारीरिक सीमाएँ (Physiological Vulnerability)</h2>

<p>नवजात बछड़ा ताप-नियंत्रण (Thermoregulation) की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील होता है।

उसके शरीर में ब्राउन फैट का भंडार सीमित होता है, त्वचा पतली होती है और पसीना-ग्रंथि तथा रक्तवाहिनियों का ताप-नियंत्रण तंत्र पूर्ण विकसित नहीं होता।

जब परिवेश का तापमान 10°C से नीचे गिरता है, तो बछड़े का शरीर अपने कोर तापमान (Normal 101.5–102.5°F) को बनाए रखने में असफल होने लगता है।

यहीं से Hypothermia की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।</p>


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<h2>सर्दी में मृत्यु के तीन मौन कातिल</h2>


<h3>1. Hypothermia (शांत ठंडा झटका)</h3>

<p>जब बछड़े का शरीर तापमान 100°F से नीचे गिरता है, तो मेटाबोलिक एन्जाइमों की कार्यक्षमता घट जाती है।

ग्लूकोज उपयोग धीमा हो जाता है, हृदय-गति मंद पड़ती है और श्वसन क्षमता घटती है।

यह स्थिति यदि 6–12 घंटे तक बनी रहती है तो बछड़ा बहु-अंग विफलता (Multi-organ failure) की ओर बढ़ जाता है।</p>


<h3>2. Dehydration (छुपा हुआ सूखापन)</h3>

<p>ठंड में बछड़े दूध कम पीते हैं। दूध सेवन में कमी → द्रव की कमी → रक्त गाढ़ा → गुर्दे एवं मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव।

यह स्थिति Hypothermia को और घातक बना देती है।</p>


<h3>3. Pneumonia (श्वसन तंत्र संक्रमण)</h3>

<p>ठंडा और नम फर्श, हवा का सीधा झोंका तथा कम प्रतिरक्षा के कारण बछड़ों में

Pasteurella, Mycoplasma एवं E. coli जैसे जीवाणुओं से निमोनिया विकसित हो जाता है, जो मृत्यु-दर को कई गुना बढ़ा देता है।</p>


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<h2>Differential Diagnosis (भ्रम से बचें)</h2>

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<li>नवजात सेप्टीसीमिया</li>

<li>कोलोस्ट्रम की कमी</li>

<li>नाभि संक्रमण (Navel ill)</li>

<li>वायरल एंटराइटिस</li>

<li>जन्मजात दुर्बलता</li>

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<h2>72-घंटे का पशु-चिकित्सकीय जीवन-रक्षक प्रोटोकॉल</h2>


<h3>पर्यावरणीय प्रबंधन</h3>

<p>• सूखा, हवा-रोधी शेड<br>

• जन्म के तुरंत बाद बछड़े को पोंछकर सुखाना<br>

• सूखे बोरे या कंबल से ढंकना</p>


<h3>ऊर्जा एवं तरल प्रबंधन</h3>

<p>• गुनगुना पानी + 20–30 ग्राम गुड़ दिन में 2 बार<br>

• समय पर कोलोस्ट्रम (पहले 2 घंटे में)</p>


<h3>ताप बहाली (Thermal Recovery)</h3>

<p>• सरसों तेल से हल्की मालिश<br>

• पैरों और पेट को विशेष गर्म रखना</p>


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<h2>Danger Signs – तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ</h2>

<p>• कान अत्यधिक ठंडे<br>

• सांस तेज या कष्टपूर्ण<br>

• दूध बिल्कुल छोड़ देना<br>

• खांसी या नाक से स्राव</p>


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<h2>निष्कर्ष</h2>

<p>सर्दियों में बछड़ों की मृत्यु कोई “भाग्य” नहीं बल्कि एक प्रबंधनीय जैविक संकट है।

समय पर ताप, तरल और पोषण प्रबंधन द्वारा 80% से अधिक मौतों को रोका जा सकता है।

हर पशुपालक को यह 72-घंटे का प्रोटोकॉल अवश्य अपनाना चाहिए।</p>